साधारण शब्दों में, कैशलेस इलाज का मतलब है कि अस्पताल में भर्ती होने पर आपको अपने बिल का भुगतान सीधे अपनी जेब से नहीं करना पड़ता। इसके बजाय, बीमा कंपनी और अस्पताल आपस में तालमेल बिठाकर बिल का निपटारा करते हैं।
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कैशलेस इलाज की प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
भर्ती होने के तरीके के आधार पर इसकी दो प्रक्रियाएं होती हैं:
1. प्लान्ड हॉस्पिटलाइजेशन (जब आपको पहले से पता हो)
यदि आपको पता है कि 10 दिन बाद कोई सर्जरी होनी है, तो:
- भर्ती होने से 48 से 72 घंटे पहले अस्पताल के ‘इंश्योरेंस डेस्क’ पर अपनी पॉलिसी की जानकारी दें।
- वहां ‘प्री-ऑथराइजेशन फॉर्म’ (Pre-authorization form) भरें।
- कंपनी से मंजूरी (Approval) मिलते ही आपका इलाज कैशलेस मोड में शुरू हो जाएगा।
2. इमरजेंसी हॉस्पिटलाइजेशन (आपातकालीन स्थिति में)
अचानक बीमारी या दुर्घटना होने पर:
- अस्पताल के इंश्योरेंस काउंटर पर अपना हेल्थ कार्ड और आधार कार्ड दिखाएं।
- अस्पताल 24 घंटे के भीतर बीमा कंपनी को जानकारी भेजता है।
- कंपनी शुरुआती जांच के बाद ‘प्रोविजनल अप्रूवल’ दे देती है और इलाज शुरू हो जाता है।
कैशलेस क्लेम के लिए जरूरी दस्तावेज
अस्पताल जाते समय इन चीजों को साथ रखना न भूलें:
- बीमा कंपनी द्वारा जारी किया गया हेल्थ इंश्योरेंस कार्ड।
- मरीज का फोटो आईडी प्रूफ (आधार कार्ड, पैन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस)।
- डॉक्टर द्वारा दी गई ‘भर्ती होने की सलाह’ (Hospitalization Advice/Prescription)।
- पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स (यदि कोई हो)।
क्या सब कुछ मुफ्त होता है? (ध्यान रखने योग्य बातें)
कैशलेस का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपका बिल ₹0 होगा। कुछ चीजें ऐसी हैं जो आपको अपनी जेब से देनी पड़ सकती हैं:
- नॉन-मेडिकल खर्च: जैसे दस्ताने (Gloves), मास्क, नेबुलाइजर किट, एडमिशन फीस और फाइल चार्ज।
- कंज्यूमेबल्स: खाने-पीने का सामान या अस्पताल में रहने वाले अटेंडेंट का खर्च।
- को-पेमेंट: यदि आपकी पॉलिसी में को-पेमेंट क्लॉज है, तो बिल का एक हिस्सा (जैसे 10%) आपको देना होगा।
कैशलेस सुविधा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको अपनी सेविंग्स या एफडी (FD) तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। पॉलिसी लेते समय हमेशा यह सुनिश्चित करें कि आपकी कंपनी के पास विस्तृत नेटवर्क अस्पताल हों और प्रक्रिया सरल हो।
