भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (NHP 2017) ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था: सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर व्यय को GDP का 2.5% तक बढ़ाना, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 40% (यानी GDP का लगभग 1%) होना चाहिए। यह लक्ष्य 2025 तक हासिल करने का था, ताकि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) सुनिश्चित हो सके, आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE) कम हो और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा मजबूत बने।
लेकिन फरवरी 2026 तक की स्थिति निराशाजनक है। 2025-26 के बजट अनुमानों और हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का मात्र 1.8% है, जबकि केंद्र सरकार का हिस्सा 0.29% के आसपास है। यूनियन बजट 2026-27 में स्वास्थ्य मंत्रालय को ₹1.06 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो कुल बजट का लगभग 1.9-2% है, लेकिन GDP के संदर्भ में यह अभी भी बहुत कम है।
वर्तमान स्वास्थ्य बजट की स्थिति (2026 तक)
- कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय (सरकार + राज्य): GDP का 1.8% (PRS India और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार)। यह 2022-23 में 2.1% के आसपास था, लेकिन इसमें पानी, स्वच्छता आदि शामिल हैं। शुद्ध स्वास्थ्य व्यय इससे कम है।
- केंद्र सरकार का हिस्सा: 2025-26 BE में GDP का 0.29% (The Hindu, जनवरी 2026)। COVID के दौरान यह 0.37% था, लेकिन उसके बाद गिरावट आई है।
- राज्यों का हिस्सा: 2017-18 के 0.67% से बढ़कर 2025-26 में 1.1% GDP तक पहुंचा है। राज्य स्वास्थ्य पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, लेकिन केंद्र की कमी से असमानता बढ़ रही है।
- कुल स्वास्थ्य व्यय (सार्वजनिक + निजी): GDP का लगभग 3-3.5% (World Bank और WHO डेटा), लेकिन OOPE अभी भी 39% के आसपास है, जो गरीब परिवारों पर बोझ डालता है।
यूनियन बजट 2026-27 में स्वास्थ्य आवंटन में 9-10% की वृद्धि हुई है (₹1.06 लाख करोड़), लेकिन मुद्रास्फीति और GDP वृद्धि को देखते हुए वास्तविक वृद्धि सीमित है। कई योजनाओं में underspending की समस्या बनी हुई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्यों से दूरी क्यों एक बड़ी चुनौती?
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के प्रमुख लक्ष्य थे:
- GDP का 2.5% स्वास्थ्य पर (2025 तक)।
- केंद्र का 40% हिस्सा (GDP का 1%)।
- OOPE को 60% से घटाकर 50% से कम करना।
- प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल मजबूत करना, HWC स्थापित करना, आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं।
कमी की वजहें और चुनौतियां:
- लक्ष्य हासिल न होना: 2025 बीत चुका है, लेकिन व्यय 1.8% पर अटका है। केंद्र का हिस्सा 0.29% है, जबकि 1% होना चाहिए था। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा कमजोर रहता है।
- केंद्र-राज्य असंतुलन: राज्य बढ़ा रहे हैं, लेकिन केंद्र घटा रहा है। इससे Centrally Sponsored Schemes में फंड ट्रांसफर कम हो रहा है, जिससे राज्य स्तर पर क्रियान्वयन प्रभावित होता है।
- मुद्रास्फीति और वास्तविक गिरावट: 2025-26 का आवंटन 2020-21 की वास्तविक खर्च से 4.7% कम है (मुद्रास्फीति समायोजित)। स्वास्थ्य सेवाओं की लागत बढ़ रही है, लेकिन बजट नहीं।
- अंडर-स्पेंडिंग: NHM जैसी योजनाओं में फंड उपयोग नहीं हो पाते (2022-23 में ₹14,472 करोड़ अनस्पेंट)। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफिंग और दवाएं प्रभावित होती हैं।
- निजी क्षेत्र पर निर्भरता: कम सार्वजनिक व्यय से लोग निजी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं, जहां खर्च 5-10 गुना ज्यादा होता है। OOPE अभी भी ऊंचा है, गरीबी और कर्ज बढ़ाता है।
- वैश्विक तुलना में पिछड़ापन: ब्राजील (10%), दक्षिण अफ्रीका (9%), चीन (6%) की तुलना में भारत बहुत कम खर्च करता है। BRICS में सबसे नीचे है।
- लंबे समय की चुनौतियां: जनसंख्या वृद्धि, NCDs (डायबिटीज, कैंसर), बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है। बिना पर्याप्त बजट के UHC असंभव है।
प्रभाव और निष्कर्ष
यह कमी बड़ी चुनौती है क्योंकि:
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कमजोर रहते हैं।
- मातृ-शिशु मृत्यु दर, टीकाकरण, महामारी तैयारियों में कमी।
- गरीब परिवार इलाज छोड़ देते हैं या कर्ज में डूब जाते हैं।
- आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं प्रभावी हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी से सीमित रहती हैं।
विशेषज्ञों (PRS, Jan Swasthya Abhiyan, The Hindu) का कहना है कि केंद्र को कम से कम 1% GDP तक पहुंचना चाहिए, और कुल व्यय 3-3.5% तक बढ़ाना चाहिए। 2026-27 बजट में कुछ सकारात्मक कदम (Biopharma SHAKTI, Allied Health Professionals) हैं, लेकिन मूल लक्ष्य से दूरी बनी हुई है।
भारत को Viksit Bharat बनने के लिए स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। बजट बढ़ाना, खर्च प्रभावी उपयोग और केंद्र-राज्य समन्वय जरूरी है। तभी लाखों भारतीयों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।








