मोतियाबिंद और डायलिसिस: 24 घंटे से कम भर्ती होने वाले ‘डे-केयर’ इलाज का क्लेम कैसे लें?

हेल्थ इंश्योरेंस का एक बुनियादी नियम है कि क्लेम पाने के लिए मरीज को कम से कम 24 घंटे अस्पताल में भर्ती रहना चाहिए। लेकिन, नई तकनीकों के आने के बाद बीमा कंपनियों ने इस नियम में ढील दी है। अब ऐसी प्रक्रियाएं जो 24 घंटे से कम समय में पूरी हो जाती हैं, ‘डे-केयर ट्रीटमेंट’ के तहत पूरी तरह कवर होती हैं।

  • ध्यान दें: यह ओपीडी (OPD) से अलग है। ओपीडी में आप केवल परामर्श लेकर घर आ जाते हैं, जबकि डे-केयर में आपको अस्पताल में भर्ती (Admit) किया जाता है और ऑपरेशन थिएटर या विशेष यूनिट में इलाज होता है।

प्रमुख डे-केयर इलाज (Common Day Care Procedures)

ज्यादातर पॉलिसियां 500 से अधिक डे-केयर प्रक्रियाओं को कवर करती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. आँखें: मोतियाबिंद (Cataract) का ऑपरेशन।
  2. किडनी: डायलिसिस (Dialysis) और पथरी (Kidney Stones) निकालना।
  3. कैंसर: कीमोथेरेपी (Chemotherapy) और रेडियोथेरेपी।
  4. कान-नाक-गला: टॉन्सिल का ऑपरेशन, साइनस की सर्जरी।
  5. अन्य: हर्निया, पाइल्स सर्जरी और घुटने में इंजेक्शन (Joint Injection)।

डे-केयर इलाज का क्लेम कैसे लें?

क्लेम की प्रक्रिया काफी हद तक सामान्य बीमा क्लेम जैसी ही होती है:

1. कैशलेस क्लेम (Cashless Claim)

  • यदि आप नेटवर्क अस्पताल में इलाज करा रहे हैं, तो अस्पताल को अपनी पॉलिसी की जानकारी दें।
  • अस्पताल ‘डे-केयर’ प्रक्रिया के लिए बीमा कंपनी से प्री-ऑथराइजेशन मांगेगा।
  • मंजूरी मिलने के बाद, आप बिना पैसे दिए इलाज कराकर शाम तक घर लौट सकते हैं।

2. रीइंबर्समेंट क्लेम (Reimbursement Claim)

  • यदि अस्पताल नेटवर्क में नहीं है, तो सारा भुगतान खुद करें।
  • डिस्चार्ज समरी, ऑपरेशन नोट्स और सभी बिलों को जमा करें।
  • बीमा कंपनी को यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह एक ‘डे-केयर’ प्रक्रिया थी, न कि सामान्य ओपीडी विजिट।

इन 3 बातों का विशेष ध्यान रखें

  • मोतियाबिंद की लिमिट (Sub-limit): अधिकांश पॉलिसियों में मोतियाबिंद के लिए एक फिक्स्ड लिमिट होती है (जैसे ₹30,000 या ₹50,000 प्रति आँख)। सर्जरी से पहले अपनी लिमिट चेक करें।
  • वेटिंग पीरियड: मोतियाबिंद और पथरी जैसी बीमारियों के लिए आमतौर पर 2 साल का वेटिंग पीरियड होता है। पॉलिसी लेने के तुरंत बाद इनका क्लेम नहीं मिलता।
  • डायग्नोस्टिक सेंटर: यदि आप अस्पताल के बजाय किसी सामान्य डायग्नोस्टिक सेंटर पर टेस्ट कराते हैं, तो उसे डे-केयर नहीं माना जाएगा। इलाज एक पंजीकृत (Registered) अस्पताल या डे-केयर सेंटर में ही होना चाहिए।

‘डे-केयर’ कवर आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। पॉलिसी खरीदते समय यह सुनिश्चित करें कि आपकी कंपनी केवल ‘कुछ’ नहीं बल्कि ‘सभी’ डे-केयर प्रक्रियाओं को कवर करती हो। इससे आप छोटी सर्जरी के लिए अपनी जेब से पैसे देने से बच जाएंगे।

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