राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (NHP 2017) भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव लाई। यह 2002 की पुरानी नीति के 15 साल बाद आई और इसका मुख्य लक्ष्य है: “सभी उम्र के लोगों के लिए सबसे ऊंचा स्तर का स्वास्थ्य और कल्याण हासिल करना, रोकथाम और प्रचार वाली स्वास्थ्य देखभाल दृष्टिकोण के माध्यम से, और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना, बिना किसी को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़े।”
नीति ने स्पष्ट रूप से “सिक-केयर” (बीमारी का इलाज) से “वेलनेस” (स्वस्थ रहना) की ओर शिफ्ट किया। इसमें रोकथाम (Preventive) और प्रचार (Promotive) स्वास्थ्य देखभाल को मुख्य प्राथमिकता दी गई है, जबकि इलाज (Curative) को जरूरी लेकिन माध्यमिक माना गया है। नीति के अनुसार, सार्वजनिक संसाधनों का दो-तिहाई हिस्सा प्राथमिक देखभाल (जिसमें प्रिवेंटिव और प्रमोटिव शामिल) पर लगना चाहिए।
रोकथाम और प्रचार पर जोर देने के प्रमुख कारण
NHP 2017 में इस पर जोर देने के पीछे कई मजबूत वैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक कारण हैं:
- बीमारियों का बदलता बोझ और ड्यूल बर्डन भारत में संक्रामक रोगों (जैसे टीबी, मलेरिया) के साथ-साथ गैर-संक्रामक रोग (NCDs – डायबिटीज, हृदय रोग, कैंसर, उच्च रक्तचाप) तेजी से बढ़ रहे हैं। NCDs अब कुल मौतों का 60%+ हिस्सा हैं। ये बीमारियां लंबे समय तक चलती हैं और इलाज बहुत महंगा होता है। रोकथाम से इनकी शुरुआत रोकी जा सकती है, जैसे स्क्रीनिंग, जीवनशैली बदलाव और जोखिम कारकों (तंबाकू, शराब, अस्वास्थ्यकर आहार) पर नियंत्रण।
- आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE) को कम करना भारत में स्वास्थ्य खर्च का 39-65% लोग अपनी जेब से देते हैं, जो गरीब परिवारों को कंगाल कर देता है। प्रिवेंटिव और प्रमोटिव केयर सस्ती है और लंबे समय में OOPE को घटाती है। नीति का लक्ष्य OOPE को 60% से घटाकर 30-50% तक लाना है।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) और SDG-3 की दिशा में WHO और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG 3.8) के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि स्वास्थ्य बनाए रखना है। नीति “Health in All” अप्रोच अपनाती है, जिसमें स्वच्छता, पोषण, शिक्षा, वायु प्रदूषण नियंत्रण जैसी क्रॉस-सेक्टोरल कार्रवाई शामिल है।
- लागत-प्रभावी और टिकाऊ दृष्टिकोण इलाज महंगा और रिएक्टिव (प्रतिक्रियात्मक) है, जबकि रोकथाम प्रोएक्टिव (पूर्वसक्रिय) और सस्ती है। प्रिवेंटिव इंटरवेंशन (टीकाकरण, स्क्रीनिंग, काउंसलिंग) से अस्पतालों पर बोझ कम होता है। नीति कहती है कि प्रिवेंटिव और प्रमोटिव केयर “अंडर-रिकग्नाइज्ड रियलिटी” है, जो क्यूरेटिव के साथ दो-तरफा निरंतरता रखती है।
- हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (HWCs) और प्राथमिक देखभाल मजबूत करना 1.5 लाख+ HWCs बनाए गए हैं, जहां RMNCH+A, NCD स्क्रीनिंग, योग, आयुष, व्यवहार बदलाव जैसी सेवाएं दी जाती हैं। यह प्रिवेंटिव + प्रमोटिव + बेसिक क्यूरेटिव का मिश्रण है।
- समुदाय-आधारित और इंटर-सेक्टोरल एक्शन नीति “स्वस्थ नागरिक अभियान” और व्यवहार बदलाव संचार (BCC) पर जोर देती है, जिसमें स्कूल, कार्यस्थल और समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य शिक्षा शामिल है।
इलाज (Curative Care) से अंतर: एक तुलनात्मक विश्लेषण
| पहलू | रोकथाम और प्रचार (Preventive & Promotive Healthcare) | इलाज (Curative Care) |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | बीमारी होने से पहले रोकना और स्वास्थ्य को बढ़ावा देना | मौजूदा बीमारी का इलाज और लक्षणों को ठीक करना |
| समय का स्तर | बीमारी से पहले (प्राथमिक/द्वितीयक रोकथाम) | बीमारी होने के बाद (द्वितीयक/तृतीयक स्तर) |
| उदाहरण | टीकाकरण, NCD स्क्रीनिंग, योग/व्यायाम, तंबाकू/शराब छोड़ना, पोषण शिक्षा, स्वच्छता, काउंसलिंग | दवाइयां, सर्जरी, अस्पताल में भर्ती, कीमोथेरेपी, एंटीबायोटिक्स |
| लागत | बहुत कम (लंबे समय में बड़ी बचत) | बहुत ज्यादा (अस्पताल, विशेषज्ञ, जांच) |
| प्रभाव का स्तर | जनसंख्या स्तर पर स्वास्थ्य सुधार, OOPE और अस्पताल बोझ कम | व्यक्ति स्तर पर तत्काल राहत, लेकिन बार-बार जरूरत पड़ सकती है |
| फोकस | वेलनेस, हेल्दी लिविंग, सोशल डिटर्मिनेंट्स (पोषण, पर्यावरण, शिक्षा) | रोग नियंत्रण और उपचार |
| NHP 2017 में भूमिका | मुख्य प्राथमिकता (दो-तिहाई संसाधन प्राथमिक स्तर पर) | जरूरी लेकिन माध्यमिक/तृतीयक स्तर पर, HWCs में भी शामिल |
निष्कर्ष और प्रभाव
NHP 2017 ने भारत को “सिक-केयर” से “वेलनेस-केयर” की ओर मोड़ा, क्योंकि इलाज पर निर्भर रहना महंगा और असंभव है। रोकथाम और प्रचार से NCDs का बोझ कम होता है, जीवन प्रत्याशा बढ़ती है, और UHC हासिल करना आसान होता है। हालांकि, कार्यान्वयन में चुनौतियां हैं — जैसे बजट कमी और जागरूकता की कमी।
नीति का यह फोकस COVID जैसी महामारी के बाद और भी प्रासंगिक हो गया है, जहां मजबूत प्रिवेंटिव सिस्टम ने बचाव किया। भविष्य में, अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय 2.5% GDP तक पहुंचे और HWCs प्रभावी हों, तो भारत एक स्वस्थ और उत्पादक समाज बना सकता है।








